Happy Holi 2019

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Holi Festival Information 2019

Holi Festival Information 2019

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Holi Festival Information 2019

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पौराणिक महत्व- वराह पुराण में इसे पटवास-विलासिनी (चूर्ण से युक्त क्रीड़ाओं वाली) कहा है। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था। उसने अपने पिता के बार-बार समझाने के बाद भी विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक उपाय किए किंतु वह सफल नहीं हुआ। अंत में, उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे, क्योंकि होलिका एक चादर ओढ़ लेती थी जिससे अग्नि उसे नहीं जला पाती थी। होलिका जब प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो वह चादर प्रह्लाद के ऊपर आ गई और होलिका जलकर भस्म हो गई। तब से होलिका-दहन का प्रचलन हुआ।  वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवान्नेष्टि’ कहा गया है। इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है। इस अन्न को होला कहा जाता है इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता था।  इस पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा बसंतागम के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है। कुछ लोग इस पर्व को अग्निदेव का पूजन मात्र मानते हैं। मनु का जन्म भी इसी दिन का माना जाता है अत: इसे मन्वादि तिथि भी कहा जाता है। 

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Colors and waters, sweets and loud music, extreme madness and joy all around; this is what Holi symbolizes in India. Pointedly one of the least religious festivals in India, Holi is the most exhilarating and fun one, for young and old alike.

Marking the beginning of a new season, commemorating good harvest, Holi is named after the famous story of Holika.

Though most of know the ancient Hindu story, here is the gist of it. The Hindu mythology on the significance of Holi.

The king of demons, Hiranyakashipu was granted a boon by Lord Brahma. According to this book, he could neither be killed by a man or a woman, a day or night, inside or outside his house, neither on earth nor in the sky, neither by Astra nor shastra; thus it was impossible to kill him. As a result of this boon, he became invincible and arrogant. He attacked heaven and earth and laid down the rule that no one should worship God. Alas, his own son Prahlada was an ardent devotee of Vishnu. Despite Hiranyakashipu’s repeated threats, Prahlada did not stop worshipping Vishnu.

How is Holi celebrated?

Holi celebration occurs with a part of pleasure and vitality in Nepal. The keenness of the overall inhabitants gets its top and corresponds with the environment that is fully wealth throughout the season of Holi. This festive of color counts and is praised in Indian since past but the occurrence of Holi celebration is via every story rising with every transient year as is that the level of a stir.

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होली मनाने की विधि या होली कैसे मनाई जाती है?

होली का ये उत्सव फागुन के अंतिम दिन होलिका दहन की शाम से शुरु होता है और अगला दिन रंगों में सराबोर होने के लिये होता है। छोटे बच्चे होली के त्यौहार का बड़े उत्सुकता से इंतजार करते है तथा आने से पहले ही रंग, पिचकारी, और गुब्बारे आदि की तैयारी में लग जाते है साथ ही सड़क के चौराहे पर लकड़ी, घास और गोबर के ढ़ेर को जलाकर होलिका दहन की प्रथा को निभाते है।

लोग के दिन लोग सामाजिक विभेद को भुलाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, लोग ढोल बजा कर होली के गीतों पर नाचते-गाते हैं और घर-घर जा कर स्वादिष्ट पकवानों और मिठाईयाँ बाँटकर खुशी का इजहार करते है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।

होली का वैज्ञानिक महत्व:

होली सिर्फ एक त्योहार ही नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण से लेकर आपकी सेहत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। होली का पर्व साल में ऐसे समय पर आता है, जब मौसम में बदलाव के कारण लोग आलसी से होते हैं। ठंडे मौसम के गर्म रुख अख्तियार करने के कारण शरीर का थकान और सुस्ती महसूस करना प्राकृतिक है। होली वाले दिन सभी जोर से गाते नाचते हैं, जिससे मानवीय शरीर को नई ऊर्जा प्रदान होती है। यह त्योहार हमारे शरीर और मन पर बहुत लाभकारी प्रभाव डालता है। होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और बसंत का मौसम बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। सम्पूर्ण भारत में समाज के विभिन्न-2 स्थानों पर होलिका दहन के कारण वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है, जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है।

होली उत्सव का बदलता रूप:

समय के बदलते परिवेश से देश में होली का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। सामुदायिक त्योहार की पहचान रखने वाला यह पर्व अब धीरे-धीरे जाति और समूह के दायरे में बंट रहा है। इसकी प्राचीन परंपराएं भी तेजी से खत्म होने लगी हैं। पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे। इनको स्थानीय भाषा में फाग या फगुआ गीत कहा जाता है, लेकिन वक़्त की कमी, बदलती जीवनशैली और कई अन्य वजहों से शहरों और गावों दोनों ही जगह यह परंपराएं लुप्त होती जा रही है। अब लोगों में प्रेम की भावना ही गायब होती जा रही है। ज्यादातर लोग लोग टीवी से चिपके रहते हैं और आपसी भेदभाव की वजह से एक-दूसरे से मिलने तक भी नहीं जाते है। गांवों के चौपालों से होली खेलने के लिए निकलने वाली टोली में बुजुर्ग से लेकर युवा शामिल होते थे। यह टोली सामाजिक एकता की मिसला होती थी, परन्तु इन्टरनेट के चलन के बाद देश के युवा होली के त्यौहार को ज्यादा महत्व ना देकर दिनभर अपने मोबाइल और लैपटॉप में ही व्यस्त रहते है। 

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